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सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ!

सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।

इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

रेखा राजवंशी की ये कविताएं डायरी हैं उन स्मृतियों की, जो कवयित्री के मन में भारत को लेकर बसी हुई है । ये कविताएँ हैं तुलनात्मक अध्ययन की कि भारत में कैसा था, आंरट्रेलिया में कैसा है । ये कविताएं हैं दो संस्कृतियों को आमने-सामने रखकर उनसे स्वयं  को तलाशने की कि वे कहीं है । इन कविताओं में बचपन है, विभीशेरावस्था है, वृद्धावस्था है । माँ की कॉंपती उँगलियों में कभी त्वरित गति से चलती हुई सलाइयों का सौर्य है । कवि-मन को ये सलाइयाँ मिल जाएं तो दिल की उँगलियाँ अतीत का स्वेटर कभी बुनने लगती  कभी उधेड़ने लगती है । इन सलाइयों ने कंगारुओं के देश का एक कोलाज़ बनाया है और रंग भारत के भरे हैं । एक विकास-यात्रा है पिछले एक दशक की, जिससे धीरे-धीरे हमारी धरती एक ग्लोबल गाँव में बदल गई है ।

आलसी हरिया को मिल गए जादुई कुदाल और कुल्हाड़ा । उसने लोगों को डराना शुरू कर दिया । पर मिला क्या ?

आस्ट्रेलिया को केनबरा यूनिवर्सिटी में वर्षों तक वह पाठ्यक्रम में पढाया जाता रहा है । पंजाबी, डोगरी, मराठी, कोंकणी, उडिया आदि के अतिरिक्त उसका अंग्रेजी, नार्वेजियन, चीनी, बर्मी, नेपाली तथा बांग्ला में (बांग्लादेश में) भी रूपांतर हुआ ।

एक-एक कुटुम्ब (परिवार) को दुरुस्त करके ही पुन: "वसुधैव-कुंटुम्बकम्" का भारतीय सनातन आदर्श सार्थक होया।  ये कहानियां कुछ ऐसा ही प्रयास करती दिखती हैं। निशा भार्गव की उनकी अर्थवान कहानियां और लेखकीय ईमानदार प्रयास के लिए बधाइयाँ । पाठकों से अपेक्षा है कि वे पढे, गुने और पन्नों पर बिखरे जीवन जोड़ने वाले तत्वों को सहेज लें ।

'सफ़री झोले में' के बाद 'यहाँ से कहीं भी' अजितकुमार की यात्राओं का दूसरा संग्रह है । उनकी कविता ही नहीं, समीक्षा-कहानी-उपन्यास संरमरणादि के भी पाठक जानते है कि अजितकुमार विधाओं की जकड़बंदी म नहीं फंसते। लेखन उनके लिए कोई समर-भूमि नहीं, जहाँ जिरह-बख्तर से लेख वे लगातार तलवार  भाँजने रहें या अंतरिक्ष-यात्री का लबादा ओढ़ लंबे सफ़र पर निकल पडे ।  वह उनके लिए संवाद का सरल माध्यम है, कभी-कभी तो अपने-आप में ही संवाद का।  एक रंग के भीतर मौजूद तमाम रंग जैसे इंद्रधनुष में बिखर उठते है, कुछ-कुछ वैसा ही दृश्य— डायरी, टीप, रेखाचित्र, आत्मकथा, रपट, वार्ता जैसे  बहुत कुछ को झलकाता यात्रावृत्तों में मिलेगा।  जटिल या सरल, वह दृश्य जैसा भी है— यदि आपके लिए भी प्रीतिकर हुआ तो इम कामना की संभावना रहेगी कि जैसे उनके यात्रा-दिन बहुरे, वैसे आपके भी बहुरें । 

मस्त, फक्कड़ और विचारशील । माँ-बाप नहीं रहे, तो पारिवारिक संपत्ति को अपने गाँव के कल्याण के लिए समर्पित कर वह आवारगी करने लगा । उसकी एक अंतरंग मित्र मंडली थी, जिसके आर्थिक सहयोग से वह अपनी मनचाही जिंदगी बिता रहा था । उसकी जिंदगी में किताब, शराब और सिगरेट के अलावा और कुछ नहीं था । घुमते-फिरते वह भी नैनीत्ताल आ गया । संयोग से यह उसी गेस्ट हाउस में ठहरा जहाँ सुनंदा ठहरी हुई थी ।

आज पर्यावरण प्रदूषण के कारण पर्यावरण असंतुलन हो रहा है। इससे न केवल जीवन प्रक्रिया बाधित हो रही है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इतना ही नहीं अब पर्यावरण प्रदूषण के read more कारण प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि हो रही है, जिसके कारण प्रचुर मात्र में जन-धन की हानि हो रही है। भूमंडलीय ताप बढ़ रहा है, जिसके कारण हिमाच्छादित क्षेत्रों की काफी बर्फ पिघलने से भविष्य में समुद्रतल में वृद्धि होगी और महत्त्वपूर्ण तटीय क्षेत्र डूब जाएँगे। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण से अब जलवायु परिवर्तन का खतरा मँडरा रहा है, जिसके कारण कई जीव विलुप्त हो जाएँगे और खाद्य संकट की आशंका भी जताई जा रही है। हो सकता है कि एक दिन भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण डाइनोसोरस की तरह पृथ्वी से मानव भी विलुप्त हो जाएँ।

एक समय था, जब महाकाव्य की रचना तक पहुंचना कवियों का चरम लक्ष्य होता था । महाकाव्य में कोई एक मुख्य समय होता था; उसकी मुख्य घटनाएँ होती थीं और पचासों सैकडों प्रमुख पत्र होते थे । लेकिन जब महाकाव्य की परिभाषा बनी तब तक महाकाव्यों का रूप काफी बदल चुका था । वे काकी कुछ नायक और नायिका प्रधान हो चुके थे । उन नायकों और नाविकाओं के गोत्र, स्वभाव और बनावट भी सुनिश्चित कर लिये गये । कसौटी बना दी गयी, कविगण सोना बनाने में जूट गये । हिन्दी में संस्कृत महाकाव्यों की परिभाषाएँ लगभग ज्यों की त्यों उतार ली गयी, हालाँकि उस कसौटी पर हिन्दी के अधिकतर महाकाव्य खरे नहीं उतरते । कहा जा सकता है कि हिन्दी में महाकवि तो हुए, महाकाव्य नहीं हो सके । परिभाषाओं और सिद्धांतों में कुछ छूट के नतीजे में 'खंडकाव्य' नाम की एक नयी संज्ञा प्रकाश में आ गयी । आधे-अधूरे महाकाव्यों और भरे-भूरे खंडकाव्यों से हमारी कविता का एक पूरा ही युग बना है । वे दिन कितने अच्छे थे जब कवि महाकाव्य लिखते थे और अध्यापक महाकाव्य पढ़ाते थे और लोग भी उन्हें महाकाव्य समझकर पढ़ते थे । इस प्रकार चाहे कुछ भी लिखे, महाकाव्य ही कवि की कसौटी थी। 

आर्य जीवनकला का सर्वांगीण विकास हमें कृष्ण के पावन चरित्र में दिखाई देता है । जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली । सर्वत्र उनकी अदभुत मेधा क्या सर्वग्रासिनी प्रतिभा के दर्शन होते हैं । वे एक ओर महान् राजनीतिज्ञ, क्रान्तिबिधाता, धर्म पर आधारित नवीन साम्राज्य के स्रष्टा राष्ट्रपुरुष के रूप में दिखाई पडते हैं तो दूसरी ओर धर्म, अध्यात्म, दर्शन और नीति के सूक्ष्म चिन्तक, विवेचक क्या प्रचारक भी हैं। उनके समय में भारत देश सुदूर गांधार से लेकर दक्षिण की सह्याद्री पर्वतमाला तक क्षत्रियों के छोटे-छोटे, स्वतंत्र किन्तु निरंकुश राज्यों में विभक्त हो चुका था । उन्हें एकता के सूत्र में पिरोकर समय भरतखण्ड को एक सुदृढ़ राजनीतिक इकाई के रूप में पिरोने वाला कोई नहीं था ।

...वास्तव में संस्कृति पर लेखन एक बहुत कठिन और दुरूह काम है । संस्कृति एक कांचघर है जिसके भीतर साफ दिखाई देने वाला कई बार वह नहीं होता जो दिख रहा है । संस्कृति को बाहर से देखना भ्रामक है ।

हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस.

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